दुर्गा पूजा 2026 कोलकाता: महालया से विजयादशमी तक की तिथियाँ, संधि पूजा और कालीघाट-दक्षिणेश्वर दर्शन

दुर्गा पूजा 2026 कोलकाता: महालया से विजयादशमी तक की तिथियाँ, संधि पूजा और कालीघाट-दक्षिणेश्वर दर्शन

कोलकाता में दुर्गा पूजा 2026 की शुरुआत महालया, शनिवार 10 अक्टूबर से होगी — यही दिन सर्व पितृ अमावस्या भी है, यानी पितृ पक्ष का समापन और देवी पक्ष का आरंभ एक ही सुबह। महा षष्ठी शुक्रवार 16 अक्टूबर को बोधन के साथ पंडालों के पट खुलेंगे, महा अष्टमी सोमवार 19 अक्टूबर को पड़ेगी और उसी दिन प्रातः लगभग 10:27 से 11:15 बजे के बीच संधि पूजा का 48 मिनट का पवित्र क्षण आएगा। विजयादशमी को लेकर स्रोतों में मतभेद है — कुछ पंचांग 20 अक्टूबर (मंगलवार) तो कुछ 21 अक्टूबर (बुधवार) बताते हैं। ध्यान रहे, इस लेख की सभी तिथियाँ तात्कालिक/Tentative हैं और प्रकाशन के समय कोलकाता पंचांग से मिलान नहीं हो सका, इसलिए पूजा से पहले अपनी पंजिका या पुरोहित से पुष्टि अवश्य करें।

इस लेख में
  1. दुर्गा पूजा 2026 की तिथियाँ (कोलकाता)
  2. महालया: चंडीपाठ और देवी पक्ष का आरंभ
  3. महा षष्ठी और सप्तमी: बोधन से नवपत्रिका तक
  4. संधि पूजा: अष्टमी-नवमी का 48 मिनट का संधिक्षण
  5. कुमारी पूजा: बेलूर मठ की परंपरा
  6. नवमी होम, सिंदूर खेला और धुनुची नाच
  7. कालीघाट और दक्षिणेश्वर दर्शन
  8. पंडाल-हॉपिंग की शिष्टाचार-सूची
  9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
  10. संबंधित लेख
  11. अस्वीकरण
  12. स्रोत

यह लेख बंगाल की दुर्गा पूजा का मुख्य केंद्र (पिलर) है। नौ दिन की नवरात्रि तिथियाँ और देवी स्वरूपों की सर्व-भारतीय सूची शारदीय नवरात्रि 2026 हब में अलग से है; यहाँ केवल कोलकाता की परंपरा पर बात होगी।

दुर्गा पूजा 2026 की तिथियाँ (कोलकाता)

सभी तिथियाँ तात्कालिक/Tentative — पंचांग से पुष्टि करें।

तारीख दिन तिथि / पर्व टिप्पणी
10 अक्टूबर शनिवार महालया (सर्व पितृ अमावस्या) देवी पक्ष का आरंभ, भोर में चंडीपाठ; चोक्खु दान
11 अक्टूबर रविवार प्रतिपदा घटस्थापना — विवरण नवरात्रि हब में
16 अक्टूबर शुक्रवार महा षष्ठी बोधन, अधिवास, बिल्व निमंत्रण (एक स्रोत: 3:41–6:00 PM); पंडालों के पट खुलते हैं
17 अक्टूबर शनिवार महा सप्तमी नवपत्रिका स्नान, कोलाबौ; कुछ स्रोत 18 अक्टूबर देते हैं
18 अक्टूबर रविवार तिथि-वृद्धि / सप्तमी-अष्टमी संधि अष्टमी तिथि प्रातः 8:27 से आरंभ (एक स्रोत के अनुसार)
19 अक्टूबर सोमवार महा अष्टमी + महा नवमी पुष्पांजलि, कुमारी पूजा; संधि पूजा ~10:27–11:15 प्रातः; कुछ स्रोत नवमी 20 अक्टूबर को रखते हैं
20 अक्टूबर मंगलवार विजयादशमी (मत 1) / नवमी (मत 2) devaastha व नवरात्रि हब: दशमी; अन्य स्रोत: नवमी होम
21 अक्टूबर बुधवार विजयादशमी (मत 2) विजय मुहूर्त 2:06–2:52 PM (एक स्रोत); सिंदूर खेला, विसर्जन

इस साल की उलझन 18–21 अक्टूबर के बीच है — 18 अक्टूबर की तिथि-वृद्धि के कारण अष्टमी और नवमी लगभग एक ही सौर दिन में सिमट रही हैं और पंजिकाएँ इसका निपटारा अलग-अलग ढंग से करती हैं। बंगाल में विशुद्ध सिद्धांत और गुप्तप्रेस पंजिका के बीच एक दिन का अंतर आना नई बात नहीं है।

महालया: चंडीपाठ और देवी पक्ष का आरंभ

बंगाल में महालया केवल तर्पण का दिन नहीं, दुर्गा पूजा का भावनात्मक उद्घाटन है। महालया की भोर बंगाल में परंपरागत रूप से आकाशवाणी पर “महिषासुरमर्दिनी” सुना जाता है — बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज़ में चंडीपाठ, जो लोकप्रिय मान्यता के अनुसार 1930 के दशक से चली आ रही परंपरा है। “जागो दुर्गा” सुनकर पूरा शहर मान लेता है कि माँ का आगमन हो गया।

इसी दिन हुगली के घाटों — बाबूघाट, आहिरीटोला, बागबाज़ार — पर हज़ारों लोग पितरों का तर्पण करते हैं, क्योंकि महालया अमावस्या पितृ पक्ष का अंतिम दिन है (देखें: सर्व पितृ अमावस्या 2026)। कुमारटुली के शिल्पी इसी दिन प्रतिमाओं पर चोक्खु दान करते हैं — देवी की आँखें आँकने का शुभ कार्य। महालया से षष्ठी तक के छह दिन “देवी पक्ष” कहलाते हैं, जब पंडाल सजते हैं और ढाक की पहली थाप सुनाई देने लगती है।

महा षष्ठी और सप्तमी: बोधन से नवपत्रिका तक

षष्ठी की शाम बोधन होता है — बेल-वृक्ष के नीचे देवी को असमय “जगाने” का अनुष्ठान, इसलिए इसे “अकालबोधन” कहते हैं। फिर अधिवास-आमंत्रण के बाद प्रतिमा का मुख अनावृत होता है और पंडालों में भीड़ शुरू हो जाती है।

सप्तमी की भोर में नवपत्रिका स्नान होता है — केला, हल्दी, धान, बेल, अनार, अशोक, मान, जयंती और कचु, इन नौ पौधों को लाल किनारी वाली सफ़ेद साड़ी पहनाकर गंगा में स्नान कराया जाता है और गणेश जी के बगल में स्थापित किया जाता है; लोकभाषा में यही “कोलाबौ” है। सप्तमी से तीन दिन की मुख्य पूजा, पुष्पांजलि और भोग आरंभ होता है।

संधि पूजा: अष्टमी-नवमी का 48 मिनट का संधिक्षण

दुर्गा पूजा का आध्यात्मिक शिखर संधि पूजा है। यह अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रथम 24 मिनट — कुल 48 मिनट (दो दंड) — के संधिकाल में की जाती है। मान्यता है कि इसी क्षण देवी ने चंड-मुंड का वध किया और चामुंडा रूप धारण किया; कुछ परंपराएँ इसे महिषासुर पर अंतिम प्रहार का क्षण भी मानती हैं।

इस पूजा में 108 दीपक और 108 कमल अर्पित किए जाते हैं — कृत्तिवास रामायण के अनुसार श्रीराम ने भी अकालबोधन में 108 नीलकमल चढ़ाए थे। कुछ बोनेदी बाड़ियों में संधिक्षण पर तोप दागने की रीति रही है; आज अधिकतर जगह ढाक और शंखनाद से घोषणा होती है, और बलि की जगह केला, कद्दू या ईख की प्रतीकात्मक बलि होती है।

2026 में संधि पूजा का समय सोमवार 19 अक्टूबर, प्रातः लगभग 10:27 से 11:15 बजे (तात्कालिक) है — यह समय नई दिल्ली आधारित पंचांग से लिया गया है; एक अन्य स्रोत अष्टमी तिथि का अंत उसी सुबह 10:51 बजे बताता है, जो इस विंडो से मेल खाता है। कोलकाता की पंजिका में मिनटों का अंतर हो सकता है, इसलिए पंडाल की सूचना-पट्टिका या पुरोहित से समय पूछें। दिन में संधि पूजा होने से इस साल पंडालों में सुबह ही भारी भीड़ होगी — देखना चाहें तो 9 बजे तक पहुँचें।

कुमारी पूजा: बेलूर मठ की परंपरा

महा अष्टमी की सुबह कुमारी पूजा होती है, जिसमें एक अविवाहित कन्या (आमतौर पर 1 से 16 वर्ष) को देवी का जीवंत स्वरूप मानकर उसी विधि से पूजा जाता है जैसे प्रतिमा की। स्वामी विवेकानंद ने 1901 में बेलूर मठ में इस परंपरा को सार्वजनिक रूप दिया था, और आज भी बेलूर मठ की कुमारी पूजा देखने हज़ारों भक्त पहुँचते हैं। कन्या को लाल बनारसी, आभूषण और अलता से सजाकर आसन पर बिठाया जाता है और आयु के अनुसार संध्या, सरस्वती, कालिका, उमा, अपराजिता, भैरवी, अंबिका जैसे नाम दिए जाते हैं। बेलूर मठ में अष्टमी की सुबह लंबी कतार लगती है और मोबाइल-कैमरा प्रतिबंधित रहता है; कई सर्वजनीन पूजाएँ और बोनेदी बाड़ियाँ भी कुमारी पूजा करती हैं, जहाँ भीड़ कम होती है।

नवमी होम, सिंदूर खेला और धुनुची नाच

नवमी की सुबह होम (हवन) और महाआरती के साथ मुख्य पूजा पूर्ण होती है; खिचुड़ी, लाबड़ा और पायेस का भोग हज़ारों लोगों को बाँटा जाता है। नवमी की रात कोलकाता की सबसे लंबी रात होती है — सड़कें उत्तर से दक्षिण तक खचाखच भरी रहती हैं।

धुनुची नाच में मिट्टी की धुनुची में नारियल की जटा और कपूर सुलगाकर, ढाक की थाप पर संध्या आरती के समय नाचा जाता है। सप्तमी से नवमी तक हर शाम पंडालों में ढाकी और धुनुची नर्तक मौजूद रहते हैं।

सिंदूर खेला विजयादशमी की सुबह होता है। विवाहित महिलाएँ पहले देवी के मस्तक और पैरों पर सिंदूर लगाती हैं, पान और मिठाई से उनका मुख मीठा करती हैं (इसे “देवी बोरोन” कहते हैं), और फिर एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाकर माँ को विदा करती हैं। इसके बाद “आसछे बछोर आबार होबे” (अगले साल फिर होगा) के नारे के साथ प्रतिमा बाबूघाट, बाजे कदमतला या निमतला घाट पर विसर्जन के लिए जाती है, और शाम को “बिजया” — बड़ों के पैर छूना, मिठाई बाँटना — से त्योहार पूर्ण होता है। रेड रोड “कार्निवल” की 2026 तारीख के लिए राज्य सरकार की घोषणा देखें।

कालीघाट और दक्षिणेश्वर दर्शन

पूजा के दिनों में कालीघाट (51 शक्तिपीठों में से एक, जहाँ सती के दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरी मानी जाती हैं) और दक्षिणेश्वर (रानी रासमणि द्वारा 1855 में स्थापित माँ भवतारिणी का मंदिर, श्रीरामकृष्ण की साधना-स्थली) पर भक्तों का सैलाब उमड़ता है; अष्टमी और संधि पूजा के समय भीड़ चरम पर होती है।

दक्षिणेश्वर: मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट (dakshineswarkalitemple.org) पर सामान्य दर्शन समय प्रातः 6:30 से दोपहर 12:30 और अपराह्न 3:30 से सायं 7:30 बताया गया है, साथ ही यह भी लिखा है कि ट्रस्टी बोर्ड आवश्यकता पड़ने पर समय बदल सकता है — इसलिए पूजा के दिनों में जाने से पहले वेबसाइट पर ताज़ा सूचना देखें। मेट्रो (ब्लू लाइन का उत्तरी छोर), लोकल ट्रेन या बेलूर मठ से नौका द्वारा पहुँचें। गर्भगृह में फ़ोटोग्राफ़ी वर्जित है; चमड़े की वस्तुएँ और बड़े बैग गर्भगृह के पास न ले जाएँ; जूते निर्धारित स्टॉल पर उतारें।

कालीघाट: कालीघाट के दर्शन समय के लिए हमने कोई आधिकारिक स्रोत सत्यापित नहीं किया है, इसलिए मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट या मंदिर कार्यालय से पुष्टि करें। सामान्य अनुभव के आधार पर कुछ सुझाव:

  • भोर में जाएँ। पूजा के दिनों में सुबह 5–7 बजे की कतार सबसे छोटी होती है; 9 बजे के बाद दो-तीन घंटे लग सकते हैं।
  • “वीआईपी दर्शन” के नाम पर पैसे माँगने वाले दलालों से सावधान रहें; कोई पर्ची केवल मंदिर काउंटर से लें।
  • शालीन कपड़े पहनें — कंधे और घुटने ढके हों; लाल/पीला परंपरागत है, अनिवार्य नहीं।
  • प्रसाद-सामग्री (जबाकुसुम माला, मिठाई) का दाम पहले पूछें। कालीघाट मेट्रो से मंदिर पैदल 10 मिनट है; गाड़ी न ले जाएँ। जेबकतरों से सावधान रहें।

पंडाल-हॉपिंग की शिष्टाचार-सूची

कोलकाता में 3,000 से अधिक सर्वजनीन पूजाएँ होती हैं और 2021 में यूनेस्को ने इस पर्व को “अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” घोषित किया था। कुछ नियम मानकर ही पंडाल-हॉपिंग का आनंद है:

  1. दिन में थीम पंडाल, रात में पाड़ा की पूजा। बड़े थीम पंडालों (श्रीभूमि, संतोष मित्र स्क्वायर, सुरुचि संघ, बागबाज़ार, देशप्रिय पार्क) की कतार दिन में छोटी रहती है।
  2. एक दिन में 4–5 पंडाल पर्याप्त हैं। उत्तर (श्यामबाज़ार–बागबाज़ार–कुमारटुली) और दक्षिण कोलकाता (गड़ियाहाट–बालीगंज) अलग-अलग दिन रखें।
  3. आरती और संधि पूजा के समय पुरोहित का रास्ता न रोकें, और अनुष्ठान के बीच लोगों की तस्वीरें लेने से पहले पूछ लें।
  4. प्रतिमा के पास जूते उतारने पड़ सकते हैं — स्लिप-ऑन जूते या चप्पल पहनें।
  5. प्रसाद दाहिने हाथ से लें, भोग की कतार में धक्का-मुक्की न करें।
  6. मेट्रो का उपयोग करें — सप्तमी से नवमी तक देर रात तक चलती है; पंडाल-क्लस्टर के बीच पैदल चलें।
  7. अष्टमी-नवमी की रात भीड़ चरम पर होती है — बच्चों-बुज़ुर्गों के साथ हों तो सुबह या दोपहर चुनें।
  8. सिंदूर खेला में शामिल होना चाहें तो पहले पंडाल की महिलाओं से अनुमति लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

दुर्गा पूजा 2026 कब है?

कोलकाता में दुर्गा पूजा 2026 महालया (शनिवार 10 अक्टूबर) से शुरू होकर महा षष्ठी (शुक्रवार 16 अक्टूबर), महा सप्तमी (17/18 अक्टूबर), महा अष्टमी (सोमवार 19 अक्टूबर) से होते हुए विजयादशमी (20 या 21 अक्टूबर) पर समाप्त होगी। ये सभी तिथियाँ तात्कालिक हैं; पंचांग से पुष्टि करें।

विजयादशमी 20 या 21 अक्टूबर?

स्रोत बँटे हुए हैं। devaastha.com और हमारा नवरात्रि हब (drikpanchang, नई दिल्ली) 20 अक्टूबर (मंगलवार) बताते हैं; durga-puja-kolkata.com और walkanothermile.com 21 अक्टूबर (बुधवार, विजय मुहूर्त 2:06–2:52 PM)। कारण 18 अक्टूबर की तिथि-वृद्धि है। कोलकाता की पंजिका और अपनी पूजा समिति की घोषणा को अंतिम मानें; छुट्टी के लिए पश्चिम बंगाल सरकार की अधिसूचना देखें।

संधि पूजा 2026 का समय क्या है?

तात्कालिक रूप से सोमवार 19 अक्टूबर को प्रातः लगभग 10:27 से 11:15 बजे तक। यह अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के प्रथम 24 मिनट का 48 मिनट का संधिकाल है, जिसमें 108 दीपक और 108 कमल अर्पित होते हैं। सटीक मिनट कोलकाता की पंजिका से देखें।

महालया 2026 कब है और इसका क्या महत्व है?

महालया शनिवार 10 अक्टूबर 2026 को है — यही सर्व पितृ अमावस्या भी है। बंगाल में यह पितृ पक्ष का समापन और देवी पक्ष का आरंभ है; भोर में चंडीपाठ (“महिषासुरमर्दिनी”) सुना जाता है, घाटों पर तर्पण होता है और कुमारटुली में प्रतिमाओं का चोक्खु दान किया जाता है।

पूजा के दिनों में कालीघाट और दक्षिणेश्वर कब जाएँ?

भोर का समय सबसे अच्छा है। दक्षिणेश्वर की आधिकारिक वेबसाइट सामान्य दर्शन समय 6:30–12:30 और 3:30–7:30 बताती है, पर त्योहार में बदलाव संभव है; कालीघाट के लिए मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट देखें। शालीन कपड़े पहनें और लंबी कतार के लिए तैयार रहें।

संबंधित लेख

अस्वीकरण

इस लेख की तिथियाँ और मुहूर्त सार्वजनिक वेब स्रोतों पर आधारित हैं और प्रकाशन के समय कोलकाता-विशिष्ट पंचांग से सत्यापित नहीं हो सके, इसलिए सभी तिथियाँ तात्कालिक (Tentative) मानी जाएँ। पूजा या यात्रा की योजना से पहले बंगाली पंजिका, पूजा समिति या पुरोहित से पुष्टि करें। मंदिरों के दर्शन समय बदल सकते हैं — आधिकारिक वेबसाइट ही अंतिम स्रोत है। यह लेख चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है।

स्रोत

  • https://durga-puja-kolkata.com/blog/durga-puja-schedule-2026
  • https://www.devaastha.com/blogs/festivals/durga-puja-2026-date-significance
  • https://www.walkanothermile.com/blog/durga-puja-2026-guide.html
  • https://www.dakshineswarkalitemple.org/
  • https://www.drikpanchang.com/navratri/ashwin-shardiya-navratri-dates.html?year=2026 (नवरात्रि हब के माध्यम से)
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