जगद्धात्री पूजा 2026 का मुख्य दिन बुधवार, 18 नवंबर 2026 है, क्योंकि इस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी की उदया तिथि पड़ती है। नवमी तिथि 18 नवंबर सुबह 6:06 बजे शुरू होकर 19 नवंबर सुबह 7:07 बजे (IST) समाप्त होती है — और इसी सँकरे अंतर की वजह से कोलकाता और दिल्ली के पंचांग 18 नवंबर को एक ही तिथि नहीं बताते। यह पेच नीचे विस्तार से समझाया गया है।
इस लेख में
जगद्धात्री पूजा 2026 एक नज़र में
| तिथि / दिन | दिनांक 2026 | तिथि कब समाप्त (IST) |
|---|---|---|
| कार्तिक शुक्ल षष्ठी | रविवार, 15 नवंबर | 16 नवंबर रात 2:02 |
| कार्तिक शुक्ल सप्तमी | सोमवार, 16 नवंबर | 17 नवंबर सुबह 4:21 |
| कार्तिक शुक्ल अष्टमी | मंगलवार, 17 नवंबर | 18 नवंबर सुबह 6:06 |
| कार्तिक शुक्ल नवमी — जगद्धात्री पूजा का मुख्य दिन | बुधवार, 18 नवंबर | 19 नवंबर सुबह 7:07 |
| कार्तिक शुक्ल दशमी — विसर्जन | गुरुवार, 19 नवंबर | 20 नवंबर सुबह 7:16 |
| सूर्योदय – सूर्यास्त, कोलकाता (18 नवंबर) | सुबह 5:51 – शाम 4:52 | — |
| सूर्योदय – सूर्यास्त, नई दिल्ली (18 नवंबर) | सुबह 6:45 – शाम 5:26 | — |
तिथि-स्रोत: panchangbodh.com के दैनिक पंचांग पृष्ठ (नई दिल्ली और कोलकाता, IST, लाहिरी अयनांश), 15–19 नवंबर 2026 — 29 अक्टूबर 2026 को देखे गए। तिथि के आरंभ-समाप्ति के क्षण पूरे भारत में एक ही होते हैं; सूर्योदय और सूर्यास्त शहर-अनुसार बदलते हैं, इसलिए दोनों शहरों के मान अलग दिए गए हैं।
18 नवंबर ही मुख्य दिन क्यों — और कोलकाता में 15 मिनट का पेच
हिंदू तिथि-गणना में किसी पर्व का दिन आम तौर पर उदया तिथि से तय होता है: सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, पूरा दिन उसी के नाम लिखा जाता है। 2026 में अष्टमी तिथि 18 नवंबर सुबह 6:06 बजे समाप्त होती है और उसके ठीक बाद नवमी शुरू होती है। अब दोनों शहरों का सूर्योदय देखिए:
- नई दिल्ली, 18 नवंबर: सूर्योदय सुबह 6:45 — यानी सूर्योदय के समय नवमी पहले से चल रही है। उदया तिथि नवमी हुई, दिन जगद्धात्री नवमी का।
- कोलकाता, 18 नवंबर: सूर्योदय सुबह 5:51 — यानी सूर्योदय के समय अभी अष्टमी चल रही है, नवमी उसके 15 मिनट बाद लगेगी। सख़्त उदया-तिथि नियम से 18 नवंबर की उदया तिथि कोलकाता में अष्टमी बनती है।
panchangbodh का कोलकाता पृष्ठ यह साफ़ लिखता भी है — “18 नवंबर 2026 को कोलकाता में अष्टमी तिथि सुबह 6:06 बजे तक रहेगी। कल, 19 नवंबर को उदया तिथि नवमी है।” यह गड़बड़ी नहीं, भूगोल है: बंगाल देश के पूर्वी छोर पर है, इसलिए वहाँ सूर्य दिल्ली से लगभग 54 मिनट पहले निकलता है, और जब कोई तिथि सुबह-सुबह बदलती है तो वही क्षण एक शहर में “पहले” और दूसरे में “बाद” पड़ जाता है।
इसका व्यावहारिक मतलब क्या है? जगद्धात्री पूजा का निर्णय केवल उदया तिथि से नहीं होता — पूजा के कल्प (प्रहर) में कौन-सी तिथि चल रही है, यह भी देखा जाता है, और 18 नवंबर को सुबह 6:06 के बाद पूरा दिन तथा अगली सुबह 7:07 तक नवमी ही चलती है। इसीलिए दोनों स्रोत, panchangbodh का अक्षय नवमी पृष्ठ और बंगाली कैलेंडर साइटें, मुख्य नवमी पूजा 18 नवंबर ही बताते हैं। लेकिन अंतर इतना महीन है कि अपनी स्थानीय पंजिका और पूजा कमिटी की घोषणा से पुष्टि कर लेना ज़रूरी है — कुछ बंगाली पंजिकाएँ, जो बंगाल के सूर्योदय पर गणना करती हैं, नवमी-कृत्य 19 नवंबर पर भी रख सकती हैं। हमें 2026 की किसी मुद्रित बंगाली पंजिका का पाठ नहीं मिला, इसलिए हम यह दावा नहीं कर रहे कि वे क्या छापेंगी।
यह बिल्कुल वही गणितीय स्थिति है जो बंगाली पंजिका और उत्तर भारतीय पंचांग की गणना-पद्धति के फ़र्क़ में समझाई गई है, और इसी साल दुर्गा पूजा में भी दिखी थी, जब अष्टमी और नवमी एक ही दिन पड़ गई थीं।
एक ही दिन तीन कल्प: सप्तमी, अष्टमी और नवमी की पूजा
जगद्धात्री पूजा की सबसे ख़ास बात यही है कि कई जगह सप्तमी, अष्टमी और नवमी — तीनों की पूजा एक ही दिन, नवमी को, तीन क्रमिक प्रहरों में की जाती है। दुर्गा पूजा में ये तीन कृत्य तीन अलग दिनों में फैले होते हैं; जगद्धात्री में वे एक दिन में सिमट जाते हैं। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार उत्सव कार्तिक शुक्ल सप्तमी से आरंभ होता है पर मुख्य पूजा नवमी को होती है, और पश्चिम बंगाल में इसे “या पाँच दिन, या केवल नवमी तिथि को” मनाया जाता है — यानी एक भी एकरूप अखिल-बंगाल कार्यक्रम नहीं है, हर मंडप और हर बाड़ी का अपना क्रम है।
इसलिए ऊपर की तालिका को “चंदननगर का आधिकारिक कार्यक्रम” न समझें — वह तिथियों का पंचांगीय ढाँचा है। किस बारोवारी में षष्ठी से पूजा बैठेगी और किसमें सिर्फ़ नवमी को, यह उस कमिटी की घोषणा से ही पता चलेगा। इसी कारण इस पृष्ठ पर कोई मुहूर्त नहीं दिया गया है — कारण नीचे प्रश्नोत्तर में स्पष्ट किया गया है।
जगद्धात्री कौन हैं
“जगद्धात्री” का शाब्दिक अर्थ है जगत को धारण करने वाली — विकिपीडिया के शब्दों में “the holder of the Universe”, वह जो इस पृथ्वी के हर जीवन की रक्षा करती है। शाक्त परंपरा में उन्हें सिद्धिदात्री का रूप, और श्री भुवनेश्वरी तथा दुर्गा का सम्मिलित स्वरूप माना गया है। कुछ तंत्र-ग्रंथों तथा शिव पुराण में उन्हें उमा हैमवती कहा गया है, और कात्यायिनी तंत्र में महादुर्गा।
प्रतिमा-लक्षण: वाहन सिंह; हाथों में चक्र, धनुष, बाण और शंख; वस्त्र-वर्ण लाल और हरा। लोक-परंपरा में यह भी बताया जाता है कि सिंह के नीचे एक हाथी दबा होता है, जो करीन्द्रासुर — अहंकार के मदमस्त हाथी — का प्रतीक है, और देवी उस अहं को वश में करती हैं। ईमानदारी से बता दें: यह हाथी-प्रसंग और भुजाओं की संख्या हमें अंग्रेज़ी विकिपीडिया के लेख में नहीं मिली, वहाँ केवल वाहन और आयुध दर्ज हैं; इसलिए इसे परंपरागत विवरण मानिए, प्रमाणित शास्त्र-उद्धरण नहीं।
इसी वजह से इस पृष्ठ पर कोई मंत्र नहीं दिया गया है — 2026 की किसी प्रामाणिक मुद्रित प्रति से मूल पाठ मिलाए बिना मंत्र छापना ग़लत पाठ फैलाने का सबसे आसान तरीका है। देवी काली के सत्यापित मंत्रों के लिए काली माता के मंत्रों वाला पृष्ठ देखें।
कृष्णानगर और चंदननगर: दो परंपराएँ
कृष्णानगर और राजा कृष्णचंद्र
सबसे प्रचलित कथा यह है कि नदिया के महाराजा कृष्णचंद्र ने यह पूजा आरंभ की। विकिपीडिया के अनुसार समय पर कर न चुकाने के कारण उन्हें नवाब अलीवर्दी ख़ान ने बंदी बना लिया था और विजया दशमी के दिन छूटे; दुर्गा पूजा छूट जाने के बाद उन्होंने अपने क्षेत्र में जगद्धात्री पूजा शुरू की। यहाँ स्रोतों में मतभेद है और उसे छिपाना ठीक नहीं — एक बंगाली कैलेंडर साइट वही कहानी नवाब मीर क़ासिम के नाम से छापती है। दोनों नवाबों का काल अलग है, इसलिए इस कथा का ब्योरा अनिश्चित मानें; कथा का ढाँचा स्थिर है, पात्र का नाम नहीं।
विकिपीडिया एक वैकल्पिक परंपरा भी दर्ज करता है, जिसके अनुसार जगद्धात्री की पूजा सबसे पहले शांतिपुर के चंद्रचूड़ तर्कमणि ने राजा गिरीशचंद्र की प्रेरणा से स्थापित की, और प्रतिमा-पूजा का आरंभ ब्रह्मशासन, हरिपुर, शांतिपुर में हुआ। बाद में शारदा देवी, श्री रामकृष्ण की पत्नी, ने इस पूजा को पुनः आरंभ किया।
कृष्णानगर की सबसे लोकप्रिय पूजा चासापाड़ा की “बुड़िमा” है, जो विकिपीडिया के अनुसार 1772 में शुरू हुई; उसे “कृष्णानगर का तिरुपति” कहा जाता है और प्रतिमा पर लगभग 150 किलो सोने तथा 150 किलो चाँदी के आभूषण चढ़ते हैं। (कुछ साइटें “300 किलो से अधिक” का आँकड़ा देती हैं — हम विकिपीडिया का मान, स्रोत-सहित, दे रहे हैं।) विसर्जन के समय कृष्णानगर में एक विशेष अनुष्ठान होता है, जिसे स्थानीय लोग “सांग” कहते हैं।
चंदननगर: फ़्रांसीसी बस्ती की रोशनी
चंदननगर की जगद्धात्री पूजा की पहचान उसकी आलोकसज्जा और विसर्जन शोभायात्रा है। विकिपीडिया इस उत्सव के सौंदर्य को “फ़्रांसीसियों और बंगालियों की साझा कल्पना” का परिणाम बताता है — चंदननगर लंबे समय तक फ़्रांसीसी अधिकार में रहा — और इसकी शोभायात्रा को रियो डी जनेरो के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बताता है। विसर्जन एक दिन में नहीं निबटता; एक बंगाली समाचार-शीर्षक के अनुसार चंदननगर का निरंजन पर्व 24 नहीं, 48 घंटे चलता है।
पुरानी बाड़ी-पूजाओं में बोस परिवार की पूजा उल्लेखनीय है — लोक-स्मृति उसे 1788 से जोड़ती है, जबकि परिवार के अभिलेख 1640 तक जाते हैं। चटर्जी परिवार की पूजा 1700 में श्रीरामपुर में आरंभ हुई, 1936 में हरि मोहन चटर्जी इसे चंदननगर लाए, और 2023 में यह बंगलुरु स्थानांतरित हो गई। क्षेत्र का सबसे पुराना जगद्धात्री मंदिर विकिपीडिया के अनुसार सोमरा (हुगली) में है, जो 1621 ईस्वी में स्थापित हुआ।
जगद्धात्री पूजा का सबसे पुराना उल्लेख विकिपीडिया स्मार्त शूलपाणि के कालविवेक में, लगभग 1375–1460 के बीच, बताता है — पर वहाँ भी यह दावा “citation needed” चिह्नित है, इसलिए इसे अंतिम प्रमाण न मानें।
बंगाल के बाहर ओडिशा में भी यह पूजा होती है: बारीपदा और भांजपुर में 8 से 15 दिन का मेला लगता है, जो गोष्ठाष्टमी पर आरंभ होकर अष्टमी से दशमी तक चलता है।
नवंबर 2026 में इसके आगे क्या
- 19 नवंबर: कार्तिक शुक्ल दशमी (नवमी सुबह 7:07 पर समाप्त) — अधिकांश जगह विसर्जन और शोभायात्रा का दिन।
- 20 नवंबर: देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह — यहीं से विवाह-मुहूर्तों का मौसम खुलता है।
- 24 नवंबर: कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली। पूर्णिमा तिथि 23 नवंबर रात 11:42 से 24 नवंबर शाम 8:23 तक (नई दिल्ली, IST)। इसी दिन नवद्वीप और शांतिपुर में शाक्त रास होता है, जिसमें शक्ति की बड़ी मृण्मूर्तियाँ बनाकर पूजी जाती हैं — नदिया की वही मूर्तिकला-परंपरा, जिसे महाराजा कृष्णचंद्र का संरक्षण मिला था।
बंगाल के शाक्त वर्ष में जगद्धात्री पूजा दुर्गा पूजा और काली पूजा के बीच की कड़ी है — वही देवी, तीन स्वरूप, तीन महीने। कोलकाता की दुर्गा पूजा और कालीघाट मंदिर पर हमारे पृष्ठ इस क्रम को आगे खोलते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जगद्धात्री पूजा 2026 कब है?
मुख्य दिन बुधवार, 18 नवंबर 2026 — कार्तिक शुक्ल नवमी। नवमी तिथि 18 नवंबर सुबह 6:06 बजे से 19 नवंबर सुबह 7:07 बजे (IST) तक रहती है। विसर्जन आम तौर पर 19 नवंबर को होता है।
कोलकाता में 18 नवंबर को अष्टमी क्यों दिख रही है?
क्योंकि अष्टमी 18 नवंबर सुबह 6:06 पर समाप्त होती है और कोलकाता का सूर्योदय उसी दिन सुबह 5:51 है — यानी सूर्योदय के समय अष्टमी अभी 15 मिनट बाक़ी है। सख़्त उदया-तिथि नियम से उस दिन की उदया तिथि कोलकाता में अष्टमी बनती है, जबकि दिल्ली में (सूर्योदय 6:45) नवमी। तिथि बदलने का क्षण एक ही है; सूर्योदय अलग है।
तो पूजा 18 को करें या 19 को?
दोनों उपलब्ध स्रोत मुख्य नवमी पूजा 18 नवंबर बताते हैं, क्योंकि 6:06 के बाद पूरा दिन नवमी ही चलती है। पर अंतर इतना महीन है कि अपनी स्थानीय पंजिका या पूजा कमिटी की घोषणा से पुष्टि कर लें। हमने 2026 की मुद्रित बंगाली पंजिका नहीं देखी, इसलिए उसके पाठ पर कोई दावा नहीं कर रहे।
सप्तमी, अष्टमी और नवमी की पूजा एक ही दिन क्यों होती है?
यह जगद्धात्री पूजा की अपनी परंपरा है — कई मंडपों में तीनों कल्प नवमी के दिन तीन क्रमिक प्रहरों में संपन्न किए जाते हैं, न कि तीन अलग दिनों में जैसा दुर्गा पूजा में होता है। विकिपीडिया के अनुसार पश्चिम बंगाल में इसे या पाँच दिन, या केवल नवमी को मनाया जाता है; एकरूप कार्यक्रम नहीं है।
जगद्धात्री और दुर्गा में क्या संबंध है?
शाक्त परंपरा में जगद्धात्री को दुर्गा और श्री भुवनेश्वरी का सम्मिलित स्वरूप तथा सिद्धिदात्री का रूप माना गया है। कुछ तंत्र-ग्रंथों और शिव पुराण में उन्हें उमा हैमवती, कात्यायिनी तंत्र में महादुर्गा कहा गया है। नाम का अर्थ है — जगत को धारण करने वाली।
क्या इस पृष्ठ पर पूजा का मुहूर्त दिया गया है?
नहीं, जान-बूझकर नहीं। मुहूर्त शहर-सापेक्ष होता है और हमें 2026 के लिए कोलकाता या चंदननगर का कोई शहर-लिखा, भरोसेमंद मुहूर्त-मान नहीं मिला। बिना शहर के छपे समय एक जगह सही और दूसरी जगह ग़लत होते हैं, इसलिए उन्हें दोहराने के बजाय छोड़ दिया गया है। स्थानीय पुरोहित या पंजिका से समय लें।
चंदननगर की पूजा किसलिए प्रसिद्ध है?
आलोकसज्जा और विसर्जन शोभायात्रा के लिए। विकिपीडिया इस शोभायात्रा को रियो डी जनेरो के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बताता है, और उत्सव के सौंदर्य को फ़्रांसीसी तथा बंगाली कल्पना के मेल का परिणाम कहता है — चंदननगर लंबे समय तक फ़्रांसीसी अधिकार में था।
कृष्णानगर की “बुड़िमा” क्या है?
चासापाड़ा की जगद्धात्री प्रतिमा, जो विकिपीडिया के अनुसार 1772 में आरंभ हुई और कृष्णानगर की सबसे लोकप्रिय पूजा है। उसे “कृष्णानगर का तिरुपति” कहा जाता है; प्रतिमा पर लगभग 150 किलो सोने और 150 किलो चाँदी के आभूषण चढ़ाए जाते हैं।
स्रोत
- panchangbodh.com — दैनिक पंचांग, नई दिल्ली (IST, लाहिरी अयनांश): 15, 16, 17 और 19 नवंबर 2026 के तिथि-कोष्ठक; तथा कोलकाता, 18 नवंबर 2026 (सूर्योदय 5:51, सूर्यास्त 4:52)। 29 अक्टूबर 2026 को देखे गए।
- panchangbodh.com — अक्षय नवमी पृष्ठ: “अक्षय नवमी 2026: 18 नवंबर (बुधवार)”, कार्तिक शुक्ल नवमी।
- panchangbodh.com — कार्तिक पूर्णिमा पृष्ठ: पूर्णिमा 23 नवंबर रात 11:42 से 24 नवंबर शाम 8:23 (IST)।
- en.wikipedia.org — “Jagaddhatri Puja”: तिथि-परंपरा, नाम का अर्थ, कृष्णचंद्र और शारदा देवी प्रसंग, बुड़िमा (1772), सोमरा मंदिर (1621), चंदननगर की शोभायात्रा, बोस एवं चटर्जी बाड़ी-पूजा, ओडिशा का मेला।
- en.wikipedia.org — “Shakta Rash”: नवद्वीप-शांतिपुर परंपरा, कार्तिक पूर्णिमा, 24 नवंबर 2026।
- banglacalendartoday.in — जगद्धात्री पूजा 2026: मुख्य नवमी 18 नवंबर 2026 (केवल तिथि-पुष्टि के लिए; इस पृष्ठ के मुहूर्त-समय शहर-रहित और आपस में विरोधाभासी हैं, इसलिए उपयोग नहीं किए गए)।
यदि आपको अपने शहर की पंजिका के अनुसार समय और कल्प-क्रम की पुष्टि चाहिए, तो किसी स्थानीय पुरोहित या पंचांग-विशेषज्ञ से बात करना सबसे भरोसेमंद रास्ता है; वैदिक फाइंडर्स पर क्षेत्र-अनुसार जानकार मिल जाते हैं।
सूचना: इस पृष्ठ की सभी तिथियाँ और समय ऊपर नामित स्रोतों से 29 अक्टूबर 2026 को लिए गए हैं और नई दिल्ली तथा कोलकाता के लिए IST में हैं। तिथि के आरंभ-समाप्ति के क्षण पूरे भारत में एक समान होते हैं, पर सूर्योदय, सूर्यास्त और मुहूर्त स्थान-सापेक्ष होते हैं — अपने नगर की पंजिका से पुष्टि कर लें। यह पृष्ठ परंपरा और पंचांग की जानकारी देने के लिए है; यह किसी धार्मिक निर्णय, चिकित्सा या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है।