संधि पूजा 2026: 19 अक्टूबर, 10:29–11:17 — 48 मिनट का पूरा हिसाब

संधि पूजा 2026 में सोमवार, 19 अक्टूबर को प्रातः 10:29 से 11:17 तक है — कुल 48 मिनट। यह अष्टमी तिथि की समाप्ति (19 अक्टूबर प्रातः 10:53) के ठीक आगे-पीछे का समय है। कुछ पंचांग अष्टमी-समाप्ति 10:51 पर गिनते हैं और इसी कारण संधि काल 10:27–11:15 छापते हैं; दोनों एक ही क्षण के इर्द-गिर्द हैं और धार्मिक दृष्टि से दो मिनट का यह अंतर महत्वहीन है।

इस लेख में
  1. संधि पूजा 2026 एक नज़र में
  2. संधि पूजा क्या है?
  3. समय में दो मिनट का अंतर क्यों दिखता है
  4. इसके पीछे की कथा क्या है?
  5. पंडाल में क्या होता है?
  6. संधि पूजा का मंत्र क्या है?
  7. घर बैठे या पंडाल में कैसे जुड़ें?
  8. संधि पूजा के बाद का क्रम
  9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  10. संबंधित लेख
  11. स्रोत

इस साल की एक बात लोगों को चौंकाती है। संधि पूजा को अक्सर शाम का अनुष्ठान मान लिया जाता है, पर 2026 में यह दिन चढ़े, सोमवार की सुबह-दोपहर के बीच पड़ रही है। काम पर जाने वालों के लिए यह सचमुच अड़चन है, इसलिए छुट्टी या देर से पहुँचने की बात पहले तय कर लेना बेहतर है।

संधि पूजा 2026 एक नज़र में

संधि पूजा सोमवार, 19 अक्टूबर 2026, प्रातः 10:29 – 11:17
अवधि 48 मिनट (दो घटी)
अष्टमी तिथि समाप्त 19 अक्टूबर, प्रातः 10:53
नवमी तिथि आरंभ 19 अक्टूबर, प्रातः 10:53 (उसी क्षण)
नवमी तिथि समाप्त 20 अक्टूबर, दोपहर 12:52
महाअष्टमी व्रत 19 अक्टूबर (सोमवार)
महानवमी, हवन, कन्या पूजन 19 अक्टूबर, संधि काल के बाद
वैकल्पिक गणना 10:27 – 11:15 (अष्टमी-समाप्ति 10:51 मानने पर)
विजयादशमी (उत्तर भारत) 20 अक्टूबर (मंगलवार)
विजया दशमी, सिंदूर खेला, विसर्जन (बंगाल) 21 अक्टूबर (बुधवार)

तिथि-स्रोत: panchangbodh (नई दिल्ली, IST, लाहिरी अयनांश), 17 अक्टूबर 2026 को देखा गया। तिथि के आरंभ-अंत के क्षण पूरे भारत में एक ही होते हैं, इसलिए संधि काल भी हर शहर में यही रहेगा। किसी पंडाल का अपना पुरोहित या पंजिका हो तो वहाँ की घोषणा देख लें।

संधि पूजा क्या है?

“संधि” का मतलब है जोड़, यानी वह बिंदु जहाँ एक चीज़ खत्म होकर दूसरी शुरू होती है। यहाँ वह जोड़ अष्टमी और नवमी तिथि के बीच का है। पूजा का नाम तिथि की इस सीमा से पड़ा है, दिन-रात के बदलाव से नहीं। इसलिए यह किसी भी घंटे पड़ सकती है — किसी साल सुबह, किसी साल आधी रात।

परंपरा के अनुसार पूरा अनुष्ठान दो घटी का होता है: अष्टमी के आख़िरी 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट। एक घटी 24 मिनट की होती है, इसीलिए कुल 48 मिनट बनते हैं। 2026 में अष्टमी 10:53 पर समाप्त होती है, इसलिए 10:29 से 10:53 तक का हिस्सा अष्टमी के आख़िरी 24 मिनट हैं और 10:53 से 11:17 तक नवमी के पहले 24 मिनट।

समय में दो मिनट का अंतर क्यों दिखता है

संधि पूजा के लिए आपको विभिन्न स्रोतों में थोड़े अलग समय मिलेंगे — कहीं 10:29 से 11:17, कहीं 10:27 से 11:15। यह विरोधाभास नहीं है।

कारण यह है कि संधि काल अपने-आप में कोई स्वतंत्र गणना नहीं है। यह अष्टमी तिथि की समाप्ति के क्षण पर केंद्रित 48 मिनट का खंड है — उस क्षण से 24 मिनट पहले और 24 मिनट बाद। गणित सीधा है:

  • अष्टमी-समाप्ति 10:53 मानें → 10:53 − 24 मिनट = 10:29, 10:53 + 24 मिनट = 11:17
  • अष्टमी-समाप्ति 10:51 मानें → 10:51 − 24 मिनट = 10:27, 10:51 + 24 मिनट = 11:15

यानी पूरा फ़र्क़ एक ही जगह से आता है: अष्टमी कब खत्म मानी गई। वह दो मिनट का अंतर गणना-पद्धति (अयनांश), नगर के देशांतर और गोल/सायन मान के चयन से आता है। संधि काल का भाव उस संक्रमण-क्षण में उपस्थित रहना है, घड़ी के सेकंड पकड़ना नहीं।

व्यावहारिक सलाह: 10:25 तक पूजा-स्थान पर उपस्थित हो जाएँ और 11:20 तक बने रहें। इससे किसी भी पंचांग का पूरा संधि काल आपके भीतर आ जाएगा। पंडाल जा रहे हों तो भीड़ के कारण और पहले पहुँचें। तिथि-गणना की यह पूरी पद्धति पंजिका और पंचांग की गणना में अंतर वाले लेख में विस्तार से दी गई है।

इसके पीछे की कथा क्या है?

कथा देवी महात्म्य यानी दुर्गा सप्तशती की परंपरा से आती है, शुंभ-निशुंभ के प्रसंग से। चंड और मुंड नाम के दो असुर देवी पर पीछे से टूट पड़े और युद्ध के नियम तोड़ दिए। क्रोध से देवी का मुख काला पड़ गया, उनके तीसरे नेत्र से चामुंडा प्रकट हुईं और दोनों असुरों का वध किया। चामुंडा नाम इन्हीं दो नामों से बना माना जाता है।

इसी क्षण की स्मृति में संधि पूजा होती है — अष्टमी के अंत और नवमी के आरंभ के जोड़ पर। यह महिषासुर वाली कथा का हिस्सा नहीं है, यह अलग प्रसंग है, और यही वजह है कि इस पूजा में देवी का रूप सौम्य नहीं, उग्र चामुंडा का होता है। काली के उग्र स्वरूप की परंपरा भी इसी धारा से जुड़ी है।

पंडाल में क्या होता है?

मुख्य चीज़ें दो गिनी जाती हैं: 108 मिट्टी के दीये एक साथ जलाना और देवी को 108 कमल चढ़ाना। दोनों इन्हीं 48 मिनट के भीतर पूरे किए जाते हैं।

पुराने ज़मींदार-घरानों की पूजाओं में शुरुआत का संकेत तोप दागकर या ढाक बजाकर दिया जाता था। आज भी कई पंडालों में ढाक की गूँज से ही लोगों को पता चलता है कि संधि का क्षण आ गया। कोलकाता के बड़े पंडालों का इस साल का पूरा कार्यक्रम कोलकाता की दुर्गा पूजा 2026 में देख सकते हैं।

बलि की परंपरा का ज़िक्र भी इतिहास का हिस्सा है। आज ज़्यादातर पूजाओं में प्रतीकात्मक बलि होती है, जैसे केला, खीरा, सफ़ेद कुम्हड़ा या गन्ना। बेलूर मठ में 1901 से जीव-बलि नहीं होती; वहाँ संधि पूजा में केला चढ़ाया जाता है।

संधि पूजा का मंत्र क्या है?

इसके लिए कोई एक छोटा मंत्र छापना ठीक नहीं होगा। पुरोहित इस पूजा में चंडी या दुर्गा सप्तशती से पाठ करते हैं और तिथि बदलने के क्षण से मिलाकर विधि चलाते हैं। जो मंत्र-पाठ हम किसी भरोसेमंद स्रोत में देख नहीं पाए, उसे यहाँ नहीं छाप रहे। घर पर करना हो तो अपने कुल-पुरोहित या पंडाल के पुरोहित से पाठ और क्रम पूछ लें।

घर बैठे या पंडाल में कैसे जुड़ें?

सोमवार की सुबह है, इसलिए पहले तय कर लें कि ऑफ़िस से छूट मिलेगी या नहीं। पंडाल जाना हो तो पूजा से पहले पहुँचें, क्योंकि 48 मिनट की अवधि छोटी है और बड़े पंडालों में भीड़ तिथि बदलने से ठीक पहले जुटती है। किस पंडाल में आरंभ किस सूचना से होगा, यह वहीं के आयोजकों से पूछना सबसे सही रहेगा।

घर पर हों तो 10:29 से 11:17 के बीच दीया जलाकर देवी का स्मरण कर लेना काफ़ी है। जिन लोगों ने कालरात्रि के सप्तमी-पूजन से क्रम शुरू किया है, उनके लिए यह उसी शृंखला की अगली कड़ी है।

संधि पूजा के बाद का क्रम

संधि काल समाप्त होने के बाद नवमी का पूजन आरंभ होता है। 2026 में चूँकि अष्टमी और नवमी एक ही दिन हैं, संधि पूजा के ठीक बाद उसी दिन हवन और कन्या/कुमारी पूजन किया जाएगा — विधि, सामग्री और समय महानवमी 2026 में दिए गए हैं। उसके आगे का क्रम इस तरह है:

  • 20 अक्टूबर (मंगलवार): उत्तर भारत में दशहरा और विजय मुहूर्त। दशमी तिथि 20 अक्टूबर दोपहर 12:52 से आरंभ होती है, और दशहरा सूर्योदय से नहीं बल्कि अपराह्न काल के नियम से तय होता है।
  • 21 अक्टूबर (बुधवार): बंगाल में विजया दशमी, सिंदूर खेला और विसर्जन।
  • 22 अक्टूबर (गुरुवार): पापांकुशा एकादशी का व्रत।

पूरे नवरात्र का दिन-वार क्रम शारदीय नवरात्रि 2026 में और माँ के वाहन से जुड़ी इस वर्ष की गणना दुर्गा के वाहन 2026 में देखी जा सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संधि पूजा कब है 2026 में?

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को प्रातः 10:29 से 11:17 तक। यह अष्टमी और नवमी के जोड़ का 48 मिनट का समय है। कुछ पंचांग 10:27–11:15 देते हैं।

क्या यह समय हर शहर में अलग होगा?

नहीं। तिथि के आरंभ और अंत के क्षण पूरे भारत में एक ही होते हैं, इसलिए संधि काल कोलकाता, दिल्ली, मुंबई — हर जगह 10:29 से 11:17 ही रहेगा। सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के समय शहर से बदलते हैं, तिथि के क्षण नहीं।

संधि पूजा में 108 दीये और कमल क्यों?

पूजा-विधि में 108 का आँकड़ा परंपरा से चला आया है, और स्रोत इतना ही बताते हैं कि 108 दीये जलते हैं और 108 कमल चढ़ते हैं। इसका कोई अलग कारण हमें किसी भरोसेमंद स्रोत में नहीं मिला, इसलिए हम कोई व्याख्या गढ़ नहीं रहे।

क्या संधि पूजा घर पर की जा सकती है?

घर में लोग उस समय दीया जलाकर देवी का स्मरण करते हैं। पूरा विधान पंडाल या पुरोहित की देखरेख में होता है, इसलिए घर के लिए अपने पुरोहित से क्रम पूछ लें।

संधि पूजा का समय हर साल क्यों बदलता है?

क्योंकि यह तिथि की सीमा से तय होती है, घड़ी के समय से नहीं। अष्टमी जिस क्षण खत्म हो, उसके आसपास के 48 मिनट ही संधि पूजा बनते हैं। इसीलिए कोई साल सुबह का समय देता है और कोई रात का।

अष्टमी का व्रत संधि पूजा के बाद खोलें या पहले?

परंपरा में अष्टमी व्रत का पारण नवमी पूजन और हवन के बाद किया जाता है, यानी 19 अक्टूबर को संधि काल बीतने के बाद। घर की परंपरा इससे भिन्न हो तो उसका पालन करें। स्वास्थ्य कारणों से — गर्भावस्था, मधुमेह, रक्तचाप या नियमित दवा — व्रत बीच में खोल देना पूरी तरह स्वीकार्य है, और ऐसी स्थिति में पहले अपने चिकित्सक से पूछ लेना चाहिए।

इस साल संधि पूजा सुबह पड़ने से क्या कोई दोष है?

नहीं। संधि काल का समय तिथि की गणना का परिणाम है, शुभ-अशुभ का संकेत नहीं। सुबह पड़ना केवल एक व्यावहारिक कठिनाई है, धार्मिक अड़चन नहीं।

बंगाल और उत्तर भारत में दशमी की तारीख अलग क्यों है?

दोनों जगह दशमी तिथि एक ही क्षण आरंभ होती है, पर अनुष्ठान का दिन तय करने का नियम अलग है। उत्तर भारत में विजयादशमी अपराह्न काल के नियम से 20 अक्टूबर पड़ती है, जबकि बंगाल की पंजिका विसर्जन और सिंदूर खेला के लिए 21 अक्टूबर देती है।

संबंधित लेख

स्रोत

  • panchangbodh — दुर्गा अष्टमी 2026 (नई दिल्ली, IST, लाहिरी अयनांश): https://panchangbodh.com/hi/durga-ashtami — इस अद्यतन में 17 अक्टूबर 2026 को देखा गया
  • panchangbodh — दुर्गा पूजा 2026: https://panchangbodh.com/hi/durga-puja — इस अद्यतन में 17 अक्टूबर 2026 को देखा गया
  • Durga Puja — Wikipedia (108 दीये, 108 कमल, बलि-परंपरा का विवरण): https://en.wikipedia.org/wiki/Durga_Puja
  • divinehindu.in — Durga Puja 2026 dates & Sandhi Puja rituals: https://www.divinehindu.in/blogs/news/durga-puja-2026-dates-sandhi-puja-rituals
  • housing.com — Significance and rituals of Sandhi Puja: https://housing.com/news/significance-and-rituals-of-sandhi-puja

सूचना: यह लेख केवल जानकारी और परंपरा के विवरण के लिए है। तिथि और समय पंचांग-गणना पर आधारित हैं और भिन्न पंचांगों में एक-दो मिनट का अंतर सामान्य है; पूजा से पहले अपने पुरोहित, पंडाल की घोषणा या कुल-परंपरा की पुष्टि कर लें। व्रत से जुड़े स्वास्थ्य निर्णयों के लिए चिकित्सक की सलाह लें। यह वेबसाइट कोई पूजा-सेवा या अनुष्ठान नहीं बेचती।

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