नरक चतुर्दशी 2026 रविवार, 8 नवंबर को है, क्योंकि इसका मुख्य कर्म — अभ्यंग स्नान — सूर्योदय से पहले का है और उस भोर में चतुर्दशी तिथि चल रही होती है। पर काली चौदस और भूत चतुर्दशी की रात 7 नवंबर (शनिवार) की है, क्योंकि वह आधी रात का कर्म है। एक ही तिथि, दो अलग तारीख़ें — और इसी वजह से इस साल कैलेंडरों में मतभेद दिख रहा है।
इस लेख में
नरक चतुर्दशी और काली चौदस 2026 — एक नज़र में
| चतुर्दशी तिथि आरंभ | 7 नवंबर 2026, सुबह 10:49 |
| चतुर्दशी तिथि समाप्त | 8 नवंबर 2026, सुबह 11:30 |
| काली चौदस / भूत चतुर्दशी (रात का कर्म) | 7 नवंबर, शनिवार की रात |
| नरक चतुर्दशी — अभ्यंग स्नान (भोर का कर्म) | 8 नवंबर, रविवार की भोर, सूर्योदय से पहले |
| नई दिल्ली सूर्योदय, 8 नवंबर | सुबह 6:38 |
| अमावस्या आरंभ | 8 नवंबर, सुबह 11:30 (प्रोकेराला 11:28) |
| अमावस्या समाप्त | 9 नवंबर, दोपहर 12:33 (प्रोकेराला 12:32) |
| दीपावली, लक्ष्मी पूजा और काली पूजा | 8 नवंबर, रविवार की संध्या और रात |
तिथि-स्रोत: panchangbodh — नरक चतुर्दशी, छोटी दिवाली, दीपावली और कार्तिक अमावस्या पृष्ठ (नई दिल्ली, IST, लाहिरी अयनांश); अमावस्या की दूसरी गणना prokerala के दीपावली पृष्ठ से (उज्जैन, IST)। सूर्योदय का समय नई दिल्ली का है।
एक ही तिथि, तीन अलग तारीख़ें — असली गणित
यह साल समझने लायक है। चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर सुबह 10:49 से 8 नवंबर सुबह 11:30 तक — यानी लगभग पच्चीस घंटे — चलती है। वह दो कैलेंडर-दिनों को छूती है, पर दोनों दिनों के अलग-अलग हिस्सों को।
हिंदू तिथि-निर्णय का मूल नियम यही है कि पर्व का निर्णय तिथि से नहीं, उस कर्म के काल से होता है जो उस पर्व का प्राण है। चतुर्दशी के तीन अलग कर्म हैं, और तीनों का काल अलग है — इसलिए तीनों की तारीख़ अलग निकलती है।
| कर्म | उसका काल | 2026 की तारीख़ |
| अभ्यंग स्नान (नरक चतुर्दशी) | सूर्योदय से पूर्व, अरुणोदय काल | 8 नवंबर की भोर |
| काली चौदस / भूत चतुर्दशी की पूजा | निशीथ, आधी रात | 7 नवंबर की रात |
| यम दीपम (जहाँ चतुर्दशी को जलाते हैं) | प्रदोष, सूर्यास्त के बाद | 7 नवंबर की संध्या |
अभ्यंग स्नान 8 नवंबर को क्यों
7 नवंबर की भोर में चतुर्दशी थी ही नहीं — वह उस दिन सुबह 10:49 पर शुरू हुई। उस भोर तक त्रयोदशी चल रही थी, जो धनतेरस की तिथि है। 8 नवंबर की भोर में चतुर्दशी चल रही है, क्योंकि वह उसी दिन 11:30 पर समाप्त होती है। इसलिए सूर्योदय-पूर्व का स्नान 8 नवंबर को ही बनता है। नई दिल्ली में उस दिन सूर्योदय 6:38 पर है, इसलिए स्नान उससे पहले।
कोलकाता का सूर्योदय दिल्ली से काफ़ी पहले होता है, पर 8 नवंबर 2026 के लिए कोलकाता का सटीक सूर्योदय-समय हम इस बार किसी ऐसे स्रोत से नहीं निकाल सके जो स्पष्ट रूप से कोलकाता के लिए रेंडर हो रहा हो — इसलिए हम कोई संख्या नहीं दे रहे। नियम याद रखिए, संख्या नहीं: स्नान आपके अपने शहर के सूर्योदय से पहले। सूर्योदय हर शहर का अलग होता है; तिथि पूरे देश में एक।
काली चौदस की रात 7 नवंबर को क्यों
रात का कर्म उस रात बनता है जिसकी आधी रात तिथि के भीतर पड़े। 7 और 8 नवंबर के बीच की आधी रात चतुर्दशी के भीतर है। 8 और 9 के बीच की आधी रात तक चतुर्दशी बीत चुकी होती है — वहाँ अमावस्या चल रही होती है, और वही काली पूजा और दीपावली की निशीथ रात है।
इसलिए इस साल दोनों रातें अलग-अलग हैं: काली चौदस 7 नवंबर की रात, काली पूजा 8 नवंबर की रात। कुछ वर्षों में ये सिमटकर पास आ जाती हैं, इस बार नहीं।
तिथि के इसी तरह के दो-दिन फैलाव पर बंगाली पंजिका और उत्तर भारतीय पंचांग अक्सर अलग निर्णय देते हैं — वह अंतर क्यों आता है, यह हमने पंजिका और पंचांग की गणना के फ़र्क़ में विस्तार से लिखा है।
नरक चतुर्दशी: अभ्यंग स्नान
परंपरा में इस दिन सूर्योदय से पहले तिल के तेल की मालिश और उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। इसे अभ्यंग स्नान कहते हैं। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के साथ नरकासुर का वध इसी तिथि पर किया और बंदी स्त्रियों को मुक्त कराया — स्नान उसी मुक्ति और शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
व्यावहारिक बात: यह कार्तिक का मौसम-संधि काल है, जब त्वचा रूखी होती है और ठंड शुरू होती है। तेल-मालिश का रिवाज इस ऋतु-परिवर्तन के साथ बैठता है।
- तेल और उबटन से एलर्जी हो सकती है — पहली बार लगा रहे हों तो कलाई पर थोड़ा लगाकर देख लें।
- छोटे बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए भोर का ठंडा पानी ठीक नहीं; गुनगुना पानी लें।
- त्वचा रोग, खुला घाव या कोई चर्म-समस्या हो तो डॉक्टर से पूछकर ही तेल लगाएँ।
भूत चतुर्दशी: बंगाल की चतुर्दशी
बंगाल में यही रात भूत चतुर्दशी कहलाती है। दो रिवाज मुख्य हैं — चोद्दो शाक यानी चौदह प्रकार की भाजी खाना, और चोद्दो प्रदीप यानी घर के कोनों में चौदह दीप जलाना।
चोद्दो शाक की परंपरा का उल्लेख सोलहवीं शताब्दी के रघुनंदन के कृत्यतत्त्व में मिलता है — यह संदर्भ हमें सीबा ट्रस्ट के शोध-लेख में मिला, जिसमें चौदहों पौधों की सूची वानस्पतिक नामों के साथ दी गई है। उसमें ओल-कचु, केउ, बेथो, कालकासुंदा, सरसों, नीम, जयंती, शालिंचा, गुलंचा, पलता, शेलुका, हिंचे, भांट और सुश्नी शामिल हैं।
उसी लेख का तर्क ध्यान देने लायक है: इनमें से अधिकतर पौधे औषधीय हैं, और कार्तिक का यह संधिकाल वही समय है जब मौसमी सर्दी-ज़ुकाम, एलर्जी और पेट की शिकायतें बढ़ती हैं। लेख का सुझाव है कि जिन “भूतों” को भगाने की बात है, वे संभवतः यही मौसमी रोग हैं, और रिवाज का असली काम हरी भाजी खाने की आदत को ज़िंदा रखना था।
चोद्दो प्रदीप का रिवाज बंगाल में व्यापक रूप से निभाया जाता है, पर इस लेख में दीप जलाने का उल्लेख नहीं है — हमने जो स्रोत खोला, उसमें केवल शाक का विवरण है। इसलिए हम दीपों की संख्या की परंपरा बताते हैं, उसका शास्त्रीय संदर्भ नहीं, क्योंकि वह हमने सत्यापित नहीं किया।
स्वास्थ्य सूचना: चौदह शाक में कई असली औषधीय पौधे हैं। इन्हें परंपरा के अनुसार भोजन के रूप में थोड़ी मात्रा में खाया जाता है — दवा के रूप में नहीं। गर्भावस्था में, किसी पुरानी बीमारी में या नियमित दवा चल रही हो तो कोई भी औषधीय पौधा खाने से पहले डॉक्टर से पूछें। किसी पौधे की पहचान पक्की न हो तो उसे न खाएँ।
काली चौदस: क्या है, क्या हम नहीं छापते
गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और दक्षिण के कुछ हिस्सों में चतुर्दशी की इस रात को काली चौदस कहा जाता है। परंपरा में यह रात शक्ति-उपासना और तांत्रिक साधना की मानी गई है, और इसी वजह से इसके इर्द-गिर्द बहुत सारी सामग्री इंटरनेट पर घूमती है।
रात्रि-उपासना की तिथियों का यही गणित भैरव की तिथियों पर भी लागू होता है — निशीथ काल से तय होने वाली कालाष्टमी 1 नवंबर और काल भैरव जयंती 1 दिसंबर पर अलग लेख देखें।
इस साइट पर हम उग्र या तांत्रिक साधना की विधि, सामग्री-सूची या सिद्धि-प्रक्रिया नहीं छापते। इसकी वजह साफ़ है: ऐसी साधनाएँ परंपरा में गुरु-परंपरा और दीक्षा के बिना नहीं की जातीं, और बिना मार्गदर्शन के पढ़कर की गई प्रक्रिया से किसी को कोई लाभ नहीं होता। जो वेबसाइटें “काली चौदस की रात की गुप्त साधना” जैसी चीज़ें मुफ़्त में बाँटती हैं, वे सामान्यतः आगे चलकर पैसे माँगने के लिए ही ऐसा करती हैं।
इस रात के नाम पर ठगी हर साल होती है — “इसी एक रात में समस्या जड़ से ख़त्म”, “आज की रात चूक गए तो साल भर रुकना पड़ेगा” जैसी बातें दबाव बनाने की तकनीक हैं, परंपरा नहीं। फ़र्ज़ी तांत्रिक की पहचान कैसे करें में हमने ये सारे संकेत विस्तार से लिखे हैं। किसी से भी अग्रिम भुगतान, “अमावस्या से पहले” की समय-सीमा, या डर दिखाकर रक़म माँगने पर रुक जाइए।
घर पर जो किया जा सकता है, वह सरल है: दीप जलाना, स्वच्छता, और माँ काली के प्रचलित मंत्रों का पाठ। उसके लिए किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं।
दीप जलाते समय
- दीप हमेशा धातु या मिट्टी की थाली पर रखें, पर्दे और बिस्तर से दूर।
- छोटे बच्चों और पालतू जानवरों की पहुँच से ऊपर।
- घर से निकलते समय या सोते समय जलते दीप न छोड़ें।
- घर के अंदर बहुत सारे दीप जलाएँ तो खिड़की खुली रखें — धुआँ जमा न हो, ख़ासकर अस्थमा या साँस की तकलीफ़ वाले सदस्य हों तो।
8 नवंबर की संध्या: अमावस्या और दीपावली
चतुर्दशी 8 नवंबर सुबह 11:30 पर समाप्त होते ही अमावस्या शुरू हो जाती है और अगले दिन दोपहर 12:33 तक रहती है। लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल और वृषभ स्थिर लग्न की होती है, इसलिए वह 8 नवंबर की संध्या को ही बनती है — अमावस्या उस समय चल रही होती है।
panchangbodh नई दिल्ली के लिए उस संध्या का प्रदोष-मुहूर्त शाम 5:54 से 7:50 और मुंबई के लिए 6:01 से 8:25 देता है। prokerala उज्जैन के लिए 5:41 से 8:17 देता है। ये तीनों अलग हैं और होने भी चाहिए — प्रदोष काल सूर्यास्त से तय होता है, और सूर्यास्त हर शहर का अपना है। इन्हें एक-दूसरे में बदलना या किसी एक को “राष्ट्रीय समय” मान लेना ग़लती है। कोलकाता के लिए पुष्ट लक्ष्मी-पूजा मुहूर्त हमने अभी नहीं निकाला है, पर उस दिन कोलकाता में सूर्यास्त शाम 4:55 पर है — दिल्ली से 36 मिनट पहले — इसलिए कोलकाता की संध्या-पूजा और निशीथ काल दोनों पहले आते हैं। यह गणना काली पूजा 2026 के पृष्ठ पर दी है।
उसी रात की निशीथ वेला काली पूजा की है। बंगाल में दीपावली की रात का मुख्य आराध्य लक्ष्मी नहीं, काली हैं — दक्षिणेश्वर और कालीघाट दोनों में इस रात की अपनी परंपरा है। शक्तिपीठ की कथा और उस रात की भीड़-व्यवस्था पर कालीघाट मंदिर का विस्तृत परिचय देखें। अमावस्या से जुड़े सामान्य उपाय भी इसी तिथि पर पड़ते हैं।
इस साल की पूरी शृंखला
- 25 अक्टूबर — कोजागरी लक्ष्मी पूजा का चंद्रोदय और निशीथ काल, बंगाल की पहली लक्ष्मी पूजा
- 6 नवंबर — धनतेरस, प्रदोष काल की पूजा
- 7 नवंबर की संध्या और रात — यम दीपम (जहाँ चतुर्दशी को जलाते हैं), काली चौदस, भूत चतुर्दशी
- 8 नवंबर की भोर — नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान
- 8 नवंबर की संध्या और रात — दीपावली और लक्ष्मी पूजा का स्थिर लग्न, काली पूजा
- 10 नवंबर — गोवर्धन पूजा
- 11 नवंबर — भाई दूज
गोवर्धन पूजा और भाई दूज की तारीख़ें panchangbodh और prokerala दोनों पर एक जैसी हैं। ध्यान दें कि कई कैलेंडर इन्हें 9 और 10 नवंबर छाप रहे हैं — वह अमावस्या के 9 नवंबर दोपहर 12:33 तक खिंचने की वजह से होने वाली चूक है, क्योंकि प्रतिपदा उसके बाद ही शुरू होती है और गोवर्धन पूजा प्रातःकाल का कर्म है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरक चतुर्दशी 2026 में 7 या 8 नवंबर को है?
8 नवंबर 2026, रविवार। चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर सुबह 10:49 से 8 नवंबर सुबह 11:30 तक है। नरक चतुर्दशी का मुख्य कर्म अभ्यंग स्नान सूर्योदय से पहले का है, और 7 नवंबर की भोर में चतुर्दशी शुरू ही नहीं हुई थी — इसलिए 8 नवंबर।
फिर काली चौदस 7 नवंबर को क्यों बताई जा रही है?
क्योंकि वह अलग कर्म है। काली चौदस की पूजा आधी रात की होती है, और 7-8 नवंबर के बीच की आधी रात चतुर्दशी के भीतर पड़ती है। एक ही तिथि के दो कर्म, दो अलग तारीख़ें — दोनों सही हैं।
भूत चतुर्दशी और नरक चतुर्दशी एक ही हैं?
तिथि एक ही है, नाम और रिवाज अलग। बंगाल में भूत चतुर्दशी पर चोद्दो शाक और चोद्दो प्रदीप की परंपरा है; उत्तर और पश्चिम भारत में उसी तिथि पर नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान होता है।
अभ्यंग स्नान कितने बजे तक कर लेना चाहिए?
अपने शहर के सूर्योदय से पहले। नई दिल्ली में 8 नवंबर को सूर्योदय 6:38 पर है। दूसरे शहरों का सूर्योदय अलग होगा — दिल्ली का समय अपने शहर पर लागू न करें। हमने इस लेख में कोलकाता का सूर्योदय जानबूझकर नहीं दिया, क्योंकि इस तारीख़ के लिए कोलकाता पर रेंडर होने वाला कोई स्रोत हम सत्यापित नहीं कर सके।
क्या काली चौदस और काली पूजा एक ही रात है?
इस साल नहीं। काली चौदस 7 नवंबर की रात है और काली पूजा 8 नवंबर की रात, क्योंकि 8-9 की आधी रात तक अमावस्या चल रही होती है, चतुर्दशी नहीं।
यम दीपम 6 नवंबर को या 7 को?
दोनों परंपराएँ प्रचलित हैं। कई परिवार इसे धनतेरस की संध्या यानी 6 नवंबर को जलाते हैं, कई चतुर्दशी की संध्या यानी 7 नवंबर को। इसका कोई एक “सही” उत्तर नहीं है — अपने कुल की परंपरा मानें।
चतुर्दशी की रात कोई विशेष साधना करनी चाहिए?
इस साइट पर हम तांत्रिक साधना की विधि नहीं देते। परंपरा में ऐसी साधनाएँ गुरु-परंपरा और दीक्षा के अंतर्गत ही की जाती हैं। घर पर दीप जलाना, स्वच्छता और मंत्र-पाठ पर्याप्त है, और उसके लिए किसी की फ़ीस देने की ज़रूरत नहीं।
अमावस्या 8 नवंबर को है या 9 को?
तिथि 8 नवंबर सुबह 11:30 से 9 नवंबर दोपहर 12:33 तक है। दीपावली की लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल की होने से 8 नवंबर की संध्या को होती है। जिन कर्मों का विधान सूर्योदय के समय की तिथि से है, वे 9 नवंबर को पड़ते हैं — इसीलिए कुछ पंचांग उसी दिन को अमावस्या के रूप में छापते हैं।
स्रोत
- panchangbodh — नरक चतुर्दशी पृष्ठ (नई दिल्ली, IST, लाहिरी अयनांश): चतुर्दशी 7 नवंबर 10:49 → 8 नवंबर 11:30; अभ्यंग स्नान 8 नवंबर, दिल्ली सूर्योदय 6:38; काली चौदस 7 नवंबर
- panchangbodh — छोटी दिवाली पृष्ठ (नई दिल्ली, IST, लाहिरी): छोटी दिवाली / नरक चतुर्दशी 8 नवंबर; वही चतुर्दशी-अवधि
- panchangbodh — दीपावली पृष्ठ (नई दिल्ली और मुंबई, IST, लाहिरी): अमावस्या 8 नवंबर 11:30 → 9 नवंबर 12:33; प्रदोष दिल्ली 5:54–7:50, मुंबई 6:01–8:25
- panchangbodh — कार्तिक अमावस्या पृष्ठ (नई दिल्ली, IST, लाहिरी): अमावस्या 9 नवंबर दोपहर 12:33 तक
- prokerala — दीपावली पृष्ठ (उज्जैन, IST): अमावस्या 8 नवंबर 11:28 → 9 नवंबर 12:32; प्रदोष 5:41–8:17; नरक चतुर्दशी 8 नवंबर; गोवर्धन पूजा 10 नवंबर; भाई दूज 11 नवंबर
- Ceiba Trust — “Bhoot Choturdoshi: an ancient shaak eating ritual with ethnomedicinal importance” (Chakraborty, Chatterjee, Hasan, 2020): चोद्दो शाक की चौदह पौधों की सूची और कृत्यतत्त्व का संदर्भ
- कोलकाता के 8 नवंबर 2026 के सूर्योदय के लिए कोई ऐसा स्रोत नहीं खुला जो स्पष्ट रूप से कोलकाता पर रेंडर हो — इसलिए वह समय इस लेख में नहीं दिया गया
सूचना: यह लेख परंपरा, तिथि-गणना और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पंचांग स्रोतों की जानकारी पर आधारित है। तिथि और मुहूर्त के समय गणना-पद्धति और शहर के अनुसार बदलते हैं — अपने स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि कर लें। यहाँ दी गई कोई बात चिकित्सकीय सलाह नहीं है; स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी निर्णय के लिए योग्य डॉक्टर से परामर्श लें। यह साइट कोई सेवा, अनुष्ठान या साधना नहीं बेचती।