देवउठनी एकादशी 2026: 20 नवंबर, तुलसी विवाह 21 नवंबर

देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी 2026 में शुक्रवार, 20 नवंबर को है और तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर की संध्या को। एकादशी तिथि 20 नवंबर प्रातः 7:16 पर आरंभ होकर 21 नवंबर प्रातः 6:31 पर समाप्त होती है — यानी इस वर्ष एकादशी किसी भी दिन के सूर्योदय को छूती ही नहीं, और यही वह गणित है जिससे स्मार्त परंपरा 20 नवंबर पर और वैष्णव परंपरा 21 नवंबर पर व्रत रखती है। तुलसी-शालिग्राम विवाह कार्तिक शुक्ल द्वादशी का कर्म है, और द्वादशी 21 नवंबर की पूरी संध्या में रहती है, इसलिए तुलसी विवाह की तिथि पर कोई भ्रम नहीं है। नीचे 19 शहरों का प्रदोष समय, पारण का नियम और पूरा तिथि-गणित है।

इस लेख में
  1. देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह 2026 एक नज़र में
  2. 20 या 21 नवंबर — एकादशी व्रत किस दिन रखें
  3. तुलसी विवाह 21 नवंबर को क्यों टिकता है
  4. शहर-वार प्रदोष काल — 21 नवंबर 2026
  5. पारण का नियम और हरि वासर
  6. तुलसी विवाह की पूजा विधि
  7. देवउठनी के बाद विवाह का सीजन
  8. व्रत और स्वास्थ्य
  9. कार्तिक मास की शेष तिथियाँ
  10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  11. स्रोत

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह 2026 एक नज़र में

देवउठनी / प्रबोधिनी एकादशी (स्मार्त) शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
एकादशी व्रत (वैष्णव) शनिवार, 21 नवंबर 2026
तुलसी विवाह — मुख्य तिथि शनिवार, 21 नवंबर 2026, संध्या/प्रदोष काल
तिथि कार्तिक शुक्ल एकादशी एवं द्वादशी
एकादशी तिथि आरंभ 20 नवंबर, प्रातः 7:16 (IST)
एकादशी तिथि समाप्त 21 नवंबर, प्रातः 6:31 (कुछ पंचांग 6:32)
द्वादशी तिथि 21 नवंबर प्रातः 6:31 → 22 नवंबर प्रातः 4:56
हरि वासर (द्वादशी का प्रथम चतुर्थांश) 21 नवंबर, प्रातः 6:31 से दोपहर लगभग 12:07 तक
तुलसी विवाह प्रदोष — कोलकाता शाम 4:51 – 7:15
तुलसी विवाह प्रदोष — नई दिल्ली शाम 5:25 – 7:49
तुलसी विवाह प्रदोष — मुंबई शाम 5:59 – 8:23
आराध्य भगवान विष्णु (शालिग्राम) और तुलसी
पिछला पर्व छठ पूजा — 13 से 16 नवंबर
अगला पर्व कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली — 24 नवंबर (पूर्णिमा 23 नवं रात 11:42 → 24 नवं शाम 8:23)

तिथि-स्रोत: panchangbodh.com के तुलसी विवाह, एकादशी-तालिका और कार्तिक पूर्णिमा पृष्ठ (नई दिल्ली, IST, लाहिरी अयनांश), तथा स्विस एफ़ेमेरिस से की गई स्वतंत्र पुनर्गणना, जो तिथि के क्षणों पर एक मिनट के भीतर मिलती है। प्रदोष की घड़ियाँ उसी शहर के सूर्यास्त से निकाली गई हैं।

20 या 21 नवंबर — एकादशी व्रत किस दिन रखें

इस वर्ष का असली प्रश्न तारीख का नहीं, नियम का है। एकादशी तिथि 20 नवंबर प्रातः 7:16 पर लगती है, पर नई दिल्ली में उस दिन सूर्योदय 6:47 पर हो जाता है — यानी सूर्योदय के समय दशमी चल रही होती है। अगले दिन 21 नवंबर को सूर्योदय 6:48 पर है, और एकादशी उससे 17 मिनट पहले, 6:31 पर समाप्त हो चुकी होती है — यानी उस दिन सूर्योदय पर द्वादशी है। दोनों दिनों में से किसी के भी सूर्योदय पर एकादशी नहीं मिलती।

जब ऐसा होता है तो निर्णय “उदया तिथि” से नहीं, तिथि के प्रभावी विस्तार से होता है। 20 नवंबर को एकादशी प्रातः 7:16 से लेकर पूरी रात तक रहती है — व्रत के जितने घंटे होते हैं, वे सब एकादशी में पड़ते हैं। इसके विपरीत 21 नवंबर को एकादशी केवल भोर के कुछ मिनट रहती है और शेष पूरा दिन द्वादशी का है, जो स्वभाव से पारण का दिन है। इसी कारण स्मार्त (गृहस्थ) परंपरा देवउठनी एकादशी 20 नवंबर को मानती है।

वैष्णव परंपरा 21 नवंबर क्यों लेती है

वैष्णव सम्प्रदाय दशमी-वेध से बचने में अधिक कठोर है। उनका मानक यह है कि अरुणोदय काल — सूर्योदय से लगभग दो घड़ी पहले — में एकादशी शुद्ध रूप से उपस्थित हो। 20 नवंबर को अरुणोदय में दशमी है, इसलिए वे उस दिन को छोड़ देते हैं और द्वादशी-युक्त एकादशी का व्रत अगले दिन, 21 नवंबर को रखते हैं। panchangbodh भी इसी कारण “स्मार्त: 20 नवंबर” और “वैष्णव: 21 नवंबर” अलग-अलग छापता है। यह दो पंचांगों का विवाद नहीं, दो सम्प्रदायों के भिन्न नियम हैं — वही संरचना जो बंगाली पंजिका और उत्तर भारतीय पंचांग के अंतर में भी दिखती है।

घर की परंपरा जो मानती आ रही हो, वही लें। नया निर्णय लेना हो तो गृहस्थ के लिए 20 नवंबर और वैष्णव दीक्षित के लिए 21 नवंबर उचित बैठता है।

तुलसी विवाह 21 नवंबर को क्यों टिकता है

तुलसी-शालिग्राम विवाह कार्तिक शुक्ल द्वादशी का कर्म है, और यह दिन का नहीं, संध्या का कर्म है — विवाह प्रदोष काल में संपन्न होता है। द्वादशी 21 नवंबर प्रातः 6:31 पर लगकर 22 नवंबर प्रातः 4:56 तक रहती है, इसलिए 21 नवंबर की पूरी संध्या द्वादशी में ही पड़ती है। यहाँ किसी गणना-विवाद की गुंजाइश नहीं है।

कुछ परिवार तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी की संध्या को ही करते हैं, यानी 20 नवंबर को। वह भी अपने तर्क में सही है — 20 नवंबर की संध्या में एकादशी तिथि चल रही होती है, क्योंकि वह प्रातः 7:16 से अगली भोर तक अटूट है। इसलिए 2026 में दोनों विकल्प तिथि-शुद्ध हैं: एकादशी-संध्या चाहने वाले 20 नवंबर को, द्वादशी-संध्या की परंपरा वाले 21 नवंबर को। panchangbodh मुख्य तिथि 21 नवंबर बताता है और यह भी जोड़ता है कि कुछ परिवार 20 नवंबर को रखते हैं।

शहर-वार प्रदोष काल — 21 नवंबर 2026

प्रदोष काल सूर्यास्त से आरंभ होकर लगभग 2 घंटे 24 मिनट चलता है। सूर्यास्त शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए तुलसी विवाह का समय देश-भर का एक नहीं होता — कोलकाता और मुंबई में इसका अंतर एक घंटे से अधिक है।

शहर सूर्यास्त प्रदोष काल
कोलकाता / हावड़ा 4:51 PM 4:51 – 7:15 PM
दुर्गापुर 4:54 PM 4:54 – 7:18 PM
आसनसोल 4:55 PM 4:55 – 7:19 PM
सिलीगुड़ी 4:44 PM 4:44 – 7:08 PM
गुवाहाटी 4:32 PM 4:32 – 6:56 PM
पटना 4:59 PM 4:59 – 7:23 PM
रांची 5:02 PM 5:02 – 7:26 PM
वाराणसी 5:08 PM 5:08 – 7:32 PM
लखनऊ 5:13 PM 5:13 – 7:37 PM
नई दिल्ली 5:25 PM 5:25 – 7:49 PM
जयपुर 5:34 PM 5:34 – 7:58 PM
भोपाल 5:34 PM 5:34 – 7:58 PM
नागपुर 5:31 PM 5:31 – 7:55 PM
अहमदाबाद 5:54 PM 5:54 – 8:18 PM
मुंबई 5:59 PM 5:59 – 8:23 PM
हैदराबाद 5:39 PM 5:39 – 8:03 PM
बेंगलुरु 5:50 PM 5:50 – 8:14 PM
चेन्नई 5:39 PM 5:39 – 8:03 PM

दिल्ली और मुंबई की पंक्तियाँ panchangbodh के तुलसी विवाह पृष्ठ से मिलती हैं; शेष शहर उसी विधि — स्थानीय सूर्यास्त और 2 घंटे 24 मिनट — से निकाले गए हैं। मोहल्ले के क्षितिज और ऊँची इमारतों के कारण व्यावहारिक सूर्यास्त एक-दो मिनट भिन्न लग सकता है।

पारण का नियम और हरि वासर

एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी में, सूर्योदय के बाद होता है — यह नियम हर एकादशी पर समान है, जैसा पापांकुशा एकादशी के पारण नियम, रमा एकादशी की पारण समय-सीमा और इंदिरा एकादशी के पृष्ठों पर भी समझाया गया है। 2026 में इसका व्यावहारिक अर्थ यह है:

  • 20 नवंबर को व्रत रखने वाले (स्मार्त): पारण 21 नवंबर को, सूर्योदय के बाद, द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी उस दिन पूरी चलती है, इसलिए समय की कोई तंगी नहीं।
  • हरि वासर: शास्त्रीय परंपरा द्वादशी के प्रथम चतुर्थांश में पारण से बचने को कहती है। द्वादशी की कुल अवधि 22 घंटे 25 मिनट है, इसलिए इसका प्रथम चतुर्थांश 21 नवंबर दोपहर लगभग 12:07 पर पूरा होता है। जो यह नियम मानते हैं, वे पारण उसके बाद करें।
  • 21 नवंबर को व्रत रखने वाले (वैष्णव): द्वादशी 22 नवंबर प्रातः 4:56 पर ही समाप्त हो जाती है, यानी सूर्योदय से पहले। ऐसी स्थिति में पारण 22 नवंबर को सूर्योदय के बाद त्रयोदशी में होता है, जो नियमतः स्वीकार्य है।

यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है: panchangbodh का एकादशी पृष्ठ इस एकादशी के लिए कोई पारण-विंडो नहीं छापता, वह केवल सामान्य नियम देता है। ऊपर के समय उसी नियम को इस वर्ष की सत्यापित तिथि-सीमाओं पर लगाकर निकाले गए हैं, किसी पंचांग से उद्धृत नहीं। अंतिम पुष्टि अपने कुल-पुरोहित या स्थानीय पंचांग से कर लें।

एक और स्रोत-भेद ध्यान देने योग्य है: panchangbodh की एकादशी-तालिका में समाप्ति “20 नवंबर प्रातः 6:32” छपी है, जबकि आरंभ 20 नवंबर प्रातः 7:16 दिया गया है — समाप्ति आरंभ से पहले, जो स्पष्टतः तारीख की छपाई-त्रुटि है। उसी साइट का तुलसी विवाह पृष्ठ द्वादशी का आरंभ “21 नवंबर प्रातः 6:32” देता है, और स्विस एफ़ेमेरिस की स्वतंत्र गणना 21 नवंबर प्रातः 6:31 निकालती है। इसलिए सही पाठ 21 नवंबर है, 20 नवंबर नहीं।

तुलसी विवाह की पूजा विधि

  • तुलसी के गमले या चौरे को धोकर गेरू या चूने से सजाएँ, और चारों ओर गन्ने की चार डालियों का मंडप बनाएँ।
  • तुलसी को दुल्हन की तरह लाल चुनरी, चूड़ी, बिंदी और सुहाग-सामग्री अर्पित करें।
  • शालिग्राम या विष्णु की प्रतिमा को तुलसी के पास, पीले वस्त्र पर स्थापित करें।
  • गौरी-गणेश पूजन, कलश स्थापना और दीप प्रज्वलन के बाद संकल्प लें।
  • तुलसी और शालिग्राम के बीच वस्त्र से गठबंधन कर मंगलाष्टक या तुलसी-विवाह के पारंपरिक गीत गाएँ, और सात परिक्रमा कराएँ।
  • आँवला, ईख, मूली, सिंघाड़ा और नए मौसमी फल भोग में रखें; प्रसाद वितरित कर कन्या-दान के भाव से विवाह संपन्न मानें।
  • दीपदान करें — कार्तिक मास में दीपदान का विशेष माहात्म्य माना जाता है, जैसा दीवाली और लक्ष्मी पूजा तथा शरद पूर्णिमा की परंपराओं में भी दिखता है।

ध्यान रखें कि विधि क्षेत्र और कुल-परंपरा से बदलती है। मैथिल, ब्रज, मारवाड़ी और बंगाली घरों में सामग्री और गीत भिन्न होते हैं; अपने घर की रीति को प्राथमिकता दें। एकादशी के व्रत और पारण की सामान्य परंपरा पर एकादशी व्रत की पौराणिक पृष्ठभूमि भी पढ़ी जा सकती है।

देवउठनी के बाद विवाह का सीजन

परंपरा में देवशयनी एकादशी (आषाढ़) से देवउठनी एकादशी (कार्तिक) तक के चार महीने चातुर्मास कहे जाते हैं, जिनमें विवाह जैसे मांगलिक कर्म स्थगित रहते हैं। देवउठनी पर विष्णु के “उठने” के साथ यह अवधि समाप्त मानी जाती है और विवाह-लग्न फिर खुलते हैं। 2026 में यह विराम 20 नवंबर को टूटता है।

यहाँ एक सावधानी ज़रूरी है: विवाह का शुभ लग्न केवल तिथि से तय नहीं होता — वर-वधू की कुंडली, चंद्र-तारा बल, गुरु और शुक्र की स्थिति, और स्थानीय पंचांग सब मिलकर निर्णय करते हैं। इसलिए यह पृष्ठ नवंबर-दिसंबर की कोई मुहूर्त-सूची नहीं दे रहा; वह आपके पंचांग और पुरोहित से ही आना चाहिए। कुंडली-स्तर के प्रश्नों पर कुंडली में प्रेम विवाह योग और विवाह में देरी के कारण जैसे पृष्ठ पृष्ठभूमि देते हैं, और व्यक्तिगत परामर्श के लिए योग्य ज्योतिषी की खोज की जा सकती है।

व्रत और स्वास्थ्य

एकादशी का व्रत कई घरों में निर्जला या फलाहारी रखा जाता है। गर्भावस्था, स्तनपान, मधुमेह, निम्न या उच्च रक्तचाप, गुर्दे या हृदय रोग, तथा नियमित दवा की स्थिति में व्रत से पहले चिकित्सक से परामर्श अनिवार्य है। चक्कर, अत्यधिक कमज़ोरी या बेचैनी हो तो व्रत तोड़ देना शास्त्र-विरुद्ध नहीं है — धर्मशास्त्र स्वयं आपद्धर्म की छूट देता है। बच्चों और वृद्धों के लिए फलाहार ही उचित है।

तुलसी विवाह में दीप और हवन-सामग्री का प्रयोग होता है, इसलिए हवादार स्थान चुनें, जलते दीप बच्चों और पालतू जानवरों की पहुँच से दूर रखें, और चुनरी या सूखे पत्तों को दीप से दूर रखें।

कार्तिक मास की शेष तिथियाँ

  • 20 नवंबर — देवउठनी एकादशी (स्मार्त), तुलसी विवाह का वैकल्पिक दिन
  • 21 नवंबर — एकादशी व्रत (वैष्णव), तुलसी विवाह की मुख्य संध्या
  • 24 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली (पूर्णिमा 23 नवं रात 11:42 से 24 नवं शाम 8:23 तक)

इससे पहले कार्तिक में काली पूजा (8 नवंबर की रात), भाई दूज (11 नवंबर) और छठ (13–16 नवंबर) पड़ चुके होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवउठनी एकादशी 2026 में कब है?

स्मार्त (गृहस्थ) परंपरा में शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को। वैष्णव परंपरा में शनिवार, 21 नवंबर को। एकादशी तिथि 20 नवंबर प्रातः 7:16 से 21 नवंबर प्रातः 6:31 तक रहती है।

तुलसी विवाह 2026 में किस दिन करें — 20 या 21 नवंबर?

मुख्य तिथि शनिवार, 21 नवंबर की संध्या है, क्योंकि तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल द्वादशी का कर्म है और द्वादशी 21 नवंबर प्रातः 6:31 से शुरू होकर पूरी संध्या चलती है। जो परिवार इसे देवउठनी एकादशी की संध्या को करते हैं, वे 20 नवंबर को करें — उस संध्या में एकादशी तिथि चल रही होती है, इसलिए वह भी तिथि-शुद्ध है।

एकादशी तिथि किसी भी सूर्योदय को क्यों नहीं छूती?

क्योंकि इस बार एकादशी की अवधि 23 घंटे 15 मिनट है और वह प्रातः 7:16 पर शुरू होती है — सूर्योदय (दिल्ली में 6:47) के ठीक बाद। अगले दिन के सूर्योदय (6:48) से 17 मिनट पहले वह समाप्त हो जाती है। तिथि की लंबाई चंद्र-गति से बदलती रहती है, इसलिए यह स्थिति किसी दोष का संकेत नहीं, सामान्य खगोलीय परिणाम है।

व्रत का पारण कब करें?

20 नवंबर को व्रत रखा हो तो पारण 21 नवंबर को सूर्योदय के बाद। जो हरि वासर का नियम मानते हैं वे द्वादशी के प्रथम चतुर्थांश के बाद, यानी लगभग दोपहर 12:07 के बाद करें। 21 नवंबर को व्रत रखा हो तो पारण 22 नवंबर की सुबह होगा, जब द्वादशी 4:56 पर समाप्त हो चुकी होगी और त्रयोदशी चल रही होगी।

तुलसी विवाह का समय पूरे देश में एक ही होता है?

नहीं। तिथि के आरंभ और समाप्ति के क्षण पूरे भारत में एक ही होते हैं, पर तुलसी विवाह प्रदोष काल में होता है और प्रदोष सूर्यास्त से तय होता है। कोलकाता में यह शाम 4:51 पर शुरू होता है, मुंबई में 5:59 पर — एक घंटे से अधिक का अंतर। ऊपर की तालिका अपने शहर के लिए देखें।

क्या देवउठनी एकादशी के बाद ही विवाह हो सकते हैं?

परंपरा में चातुर्मास के चार महीने मांगलिक कर्मों से मुक्त रखे जाते हैं और देवउठनी पर वह विराम समाप्त माना जाता है। पर यह केवल अवधि खुलने की बात है — वास्तविक विवाह-लग्न कुंडली, तारा-बल और ग्रह-स्थिति से तय होता है, जिसके लिए पंचांग और पुरोहित से मुहूर्त निकलवाना ही सही तरीका है।

तुलसी विवाह में शालिग्राम न हो तो क्या करें?

अनेक घरों में शालिग्राम नहीं होता। ऐसी स्थिति में विष्णु या कृष्ण की प्रतिमा अथवा चित्र से भी विवाह संपन्न किया जाता है — परंपरा इसकी छूट देती है। शालिग्राम खरीदने का दबाव महसूस न करें; यह आवश्यक शर्त नहीं है।

देवउठनी एकादशी और प्रबोधिनी एकादशी अलग हैं?

नहीं, ये एक ही तिथि के नाम हैं। पंचांगों में इसे प्रबोधिनी एकादशी लिखा जाता है, लोक-व्यवहार में देवउठनी, देवोत्थान या देवउठनी ग्यारस कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे तुलसी विवाह के नाम से ही जाना जाता है।

स्रोत

  • panchangbodh.com — तुलसी विवाह 2026 पृष्ठ (नई दिल्ली, IST, लाहिरी अयनांश): तुलसी विवाह शनिवार 21 नवंबर 2026, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, द्वादशी आरंभ 21 नवंबर प्रातः 6:32 (दिल्ली); प्रदोष नई दिल्ली शाम 5:25–7:49, मुंबई शाम 5:59–8:23; यह उल्लेख कि कुछ परिवार इसे 20 नवंबर, देवउठनी एकादशी को रखते हैं
  • panchangbodh.com — एकादशी तिथि तालिका (नई दिल्ली): प्रबोधिनी एकादशी, कार्तिक शुक्ल पक्ष, आरंभ 20 नवंबर 2026 प्रातः 7:16; अनुष्ठान स्मार्त 20 नवंबर, वैष्णव 21 नवंबर; पारण का सामान्य नियम “द्वादशी को सूर्योदय के बाद” (कोई विशिष्ट पारण-विंडो नहीं छपी); समाप्ति की पंक्ति में तारीख-त्रुटि
  • panchangbodh.com — कार्तिक पूर्णिमा 2026 पृष्ठ: पूर्णिमा तिथि 23 नवंबर रात 11:42 से 24 नवंबर शाम 8:23 (IST), अनुष्ठान मंगलवार 24 नवंबर
  • स्विस एफ़ेमेरिस (Swiss Ephemeris 2.10) से स्वतंत्र गणना — चंद्र-सूर्य कोणीय अंतर से कार्तिक शुक्ल एकादशी आरंभ 20 नवंबर 07:16, द्वादशी आरंभ 21 नवंबर 06:31, त्रयोदशी आरंभ 22 नवंबर 04:56, पूर्णिमा 23 नवंबर 23:42 से 24 नवंबर 20:23 (IST); तथा 18 शहरों के सूर्योदय-सूर्यास्त, जो panchangbodh के दिल्ली और मुंबई मानों से एक मिनट के भीतर मिलते हैं

सूचना: तिथि के आरंभ और समाप्ति के क्षण पूरे भारत में एक समान होते हैं, पर सूर्यास्त और इसलिए प्रदोष काल शहर के अनुसार बदलता है; ऊपर दी गई घड़ियाँ उसी शहर के लिए मान्य हैं। स्मार्त-वैष्णव भेद, पंचांग-भेद और कुल-परंपरा के कारण स्थानीय निर्णय भिन्न हो सकता है — अंतिम पुष्टि अपने कुल-पुरोहित या स्थानीय पंचांग से कर लें। पारण और हरि वासर के समय इस वर्ष की सत्यापित तिथि-सीमाओं पर शास्त्रीय नियम लगाकर निकाले गए हैं, किसी पंचांग से उद्धृत नहीं। यह पृष्ठ जानकारी के लिए है और चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं; व्रत से पहले स्वास्थ्य-स्थिति के अनुसार चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

उपयोगी लगा? साझा करें:TelegramFacebookX